40 साल बाद राज्यसभा में बनने जा रहा है सबसे बड़ा सियासी इतिहास! 24 जुलाई के बाद बदल सकता है पूरा खेल
देश की राजनीति में राज्यसभा का महत्व हमेशा से बेहद अहम रहा है। लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद किसी भी सरकार के लिए राज्यसभा में पर्याप्त संख्या बल होना बड़े विधेयकों और संवैधानिक संशोधनों को पारित कराने के लिए जरूरी माना जाता है। अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक बार फिर राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करती दिखाई दे रही है। पश्चिम बंगाल में होने वाले तीन राज्यसभा उपचुनावों के बाद पार्टी की संख्या में और बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अपेक्षित परिणाम सामने आते हैं, तो बीजेपी अपने दम पर राज्यसभा में साधारण बहुमत के आंकड़े के और करीब पहुंच जाएगी। वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) पहले से ही सदन में मजबूत स्थिति में माना जा रहा है। ऐसे में आगामी संसद के मॉनसून सत्र और संभावित बड़े विधेयकों को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
24 जुलाई को होने वाले उपचुनाव क्यों हैं अहम?
24 जुलाई को पश्चिम बंगाल की तीन राज्यसभा सीटों पर उपचुनाव प्रस्तावित हैं। ये सीटें उन तीन पूर्व सांसदों के इस्तीफे के बाद रिक्त हुई थीं, जिन्होंने बाद में भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन सीटों पर बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन की संभावना है। यदि पार्टी इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज करती है, तो राज्यसभा में उसकी कुल संख्या और मजबूत होगी।
इसी वजह से इन उपचुनावों को केवल तीन सीटों का चुनाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के बड़े समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।
राज्यसभा में कितना है बहुमत का गणित?
राज्यसभा में किसी भी दल के लिए साधारण बहुमत का आंकड़ा 123 सीटों का माना जाता है।
यदि पश्चिम बंगाल उपचुनावों के बाद बीजेपी अपनी अनुमानित बढ़त हासिल करती है, तो पार्टी इस आंकड़े से केवल कुछ सीटें दूर रह जाएगी। हालांकि अपने दम पर पूर्ण बहुमत अभी भी नहीं होगा, लेकिन यह स्थिति पार्टी की राजनीतिक ताकत को पहले की तुलना में काफी मजबूत बना सकती है।
दूसरी ओर, एनडीए के सहयोगी दलों को मिलाकर गठबंधन पहले से ही सदन में प्रभावशाली स्थिति में है।
1986 के बाद बदल सकता है बड़ा रिकॉर्ड
भारतीय राजनीति के इतिहास में वर्ष 1986 एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के पास राज्यसभा में स्पष्ट बहुमत था।
इसके बाद कई सरकारें बनीं, लेकिन किसी भी एक दल को राज्यसभा में वैसा बहुमत हासिल नहीं हो सका। अब लगभग चार दशक बाद एक बार फिर ऐसी स्थिति बनती दिखाई दे रही है, जहां एक दल अपने दम पर बहुमत के बेहद करीब पहुंच सकता है।
हालांकि अभी यह केवल संभावनाओं और आगामी चुनावी परिणामों पर निर्भर करेगा।
मॉनसून सत्र क्यों माना जा रहा है बेहद महत्वपूर्ण?
आगामी संसद का मॉनसून सत्र कई कारणों से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार इस दौरान कुछ महत्वपूर्ण विधेयक और संवैधानिक संशोधन पेश कर सकती है।
चर्चा में जिन विषयों का सबसे अधिक उल्लेख हो रहा है, उनमें शामिल हैं—
परिसीमन (Delimitation) से संबंधित प्रस्ताव
महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन से जुड़े संभावित कदम
अन्य संवैधानिक संशोधन
हालांकि सरकार की ओर से इन सभी विषयों पर अंतिम विधायी कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा का इंतजार किया जा रहा है।
संवैधानिक संशोधन के लिए कितना बहुमत जरूरी होता है?
भारतीय संविधान में संशोधन करने के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता।
अधिकांश संवैधानिक संशोधनों के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, साथ ही कुल सदस्य संख्या के बहुमत का भी प्रावधान लागू होता है। राज्यसभा में यह राजनीतिक गणित सरकार और विपक्ष दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी कारण सरकार की नजर केवल अपनी सीटों पर नहीं बल्कि सहयोगी और अन्य क्षेत्रीय दलों के रुख पर भी बनी रहती है।
क्षेत्रीय दल निभा सकते हैं निर्णायक भूमिका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई क्षेत्रीय दल आगामी महत्वपूर्ण विधेयकों के दौरान 'किंगमेकर' या 'बैलेंस ऑफ पावर' की भूमिका निभा सकते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से जिन दलों की चर्चा हो रही है, वे हैं—
DMK
दक्षिण भारत की प्रमुख पार्टी डीएमके के राज्यसभा में कई सांसद हैं। यदि पार्टी किसी विधेयक का समर्थन करती है या मतदान से दूरी बनाती है, तो उसका सीधा असर संख्या बल पर पड़ सकता है।
YSR कांग्रेस
आंध्र प्रदेश की यह पार्टी भी कई महत्वपूर्ण मौकों पर सरकार के रुख के अनुसार निर्णय लेती रही है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कुछ विधेयकों पर उसका समर्थन सरकार के लिए अहम साबित हो सकता है।
बीजू जनता दल (BJD)
ओडिशा की बीजेडी लंबे समय से कई राष्ट्रीय मुद्दों पर स्वतंत्र रुख अपनाती रही है। महिला आरक्षण जैसे विषयों पर उसका समर्थन या तटस्थ रहना सरकार के लिए लाभकारी माना जा रहा है।
अन्य सांसद
कुछ निर्दलीय सांसद और छोटे दल भी किसी संवैधानिक संशोधन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सरकार की रणनीति क्या हो सकती है?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार सरकार केवल संख्या बल बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दे रही, बल्कि विभिन्न दलों के साथ संवाद बनाए रखने की रणनीति पर भी काम कर रही है।
यदि कुछ विपक्षी दल मतदान में हिस्सा नहीं लेते या सरकार के पक्ष में मतदान करते हैं, तो दो-तिहाई बहुमत का गणित अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
हालांकि यह पूरी तरह संबंधित विधेयकों, राजनीतिक परिस्थितियों और उस समय दलों द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों पर निर्भर करेगा।
विपक्ष की चुनौती भी कम नहीं
दूसरी ओर विपक्ष भी राज्यसभा में अपनी रणनीति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। विपक्षी दलों का प्रयास रहेगा कि महत्वपूर्ण विधेयकों पर संयुक्त रणनीति बनाकर सरकार को चुनौती दी जाए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी मॉनसून सत्र केवल विधायी प्रक्रिया ही नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीतियों की भी बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।
देश की राजनीति पर क्या पड़ सकता है असर?
यदि बीजेपी और एनडीए राज्यसभा में अपनी स्थिति और मजबूत करते हैं, तो सरकार के लिए कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
हालांकि संवैधानिक संशोधन जैसे मामलों में केवल संख्या बल ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यही कारण है कि आने वाले महीनों में संसद के भीतर होने वाली हर राजनीतिक गतिविधि पर देशभर की नजरें टिकी रहेंगी।
पश्चिम बंगाल की तीन राज्यसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यदि अपेक्षित परिणाम सामने आते हैं, तो बीजेपी राज्यसभा में अपनी स्थिति और मजबूत करेगी तथा साधारण बहुमत के और करीब पहुंच जाएगी। वहीं आगामी मॉनसून सत्र में संभावित संवैधानिक संशोधनों और बड़े विधेयकों को लेकर सरकार और विपक्ष दोनों की रणनीति पर पूरे देश की नजर रहेगी। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकती है।

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